मित्रो आजे आपने बाल गणेश की एक स्टोरी बताता हु। में आपको कैसे बाल गणेश को हाथी का सर आया वो बताऊंगा। और हमे पता भी काम हम सुरु करने के लिए गणेश पूजन आवस्यक है। हम उनके पीशे क्या रहस्य है में आज आपको बताउँगा। दोस्तों इस वीडियो अगर कोई दोस्त ना देख पाये तो अवस्य यह वीडियो के निचे लिखी हुई इस स्टोरी देखे।
गणेशजी का जन्म और उन्हें हठी का सिर कैसे मिला यह कहानी हमारे हिन्दू पुराणो मई एक रोसन प्रसंग है। यह सारा प्रसंग कैलास पर्वत पर गठित हुआ। एक दिन जब भगवन शिव पर नहीं माता तैयारी करती थी और उन्होंने नंदी ने रक्षा करने रखा. और इसी वक्त भगवान शिव आये नंदी उन्होंने रोकनाही सका। ममता क्रोदित हो गए और लज्जित। और माता पार्वती ने सोचा ऐसा गण नहीं है जो मेरे आदेश का पालन करे भगवान शिव के ही सभी गण है। फिर दूसरे दिन पार्वति ने अपने सरीर पर लगा चंदन को उतरके एक मूर्ति बनाई। पार्वति जी ने इस मूर्ति को जीवित करके उसे कहा है। और माता पार्वति ने उनहे अपनी सकती और एक दिव्य सदी दी। और कहा तुम बहार जाके द्वार पे खड़े हो और कोई भीतर ना आने पाये। और माता पार्वती नहाने गए। बाल गणेश द्वार पे खड़े देख शिवजी को लगा कोई नया गण को पार्वति ने रखा होंगे द्वार पे। शिवजी जब जब महल के अंदर जाने लगे तो गणेशजी ने उन्होंने रोका। और शिवजी ने कहा यह मेरा महल है में इस जगह का मालिक हु तुम मुझे ही अंदर जाने से रोक रहे हो। और गणेश जी ने कहा "मेरी माता का आदेश है मई भीतर किसी को जाने ना दू। "
शिवजी बोले "तू पारवती के पुत्र हो ? "
गणेशजी ने कहा हा और मुझे आज्ञा दी है की में भीतर किसी को जाने ना दू।
शिवजी बोले में पार्वती का पति हूँ.
गणेशजी नहीं माने।
शिवजी बोले आप ने से बड़ो की आज्ञा का पालन करना अच्छी बात है। मगर मई पार्वती का पति हु और इस जगह का मालिक हूँ मेरे रस्ते से हैट जाओ। और गणेश को धक्का मरने की कोशिश की लेकिन गणेश हेटे नहीं।
गणेश बोले आप समझते क्यों नहीं मेरे को आदेश है।
शिवजी क्रोधित हुए और जाने के लिए गणेश को दक्का देके आगे बढे तो गणेश ने लाठी मारी। और शिव को रोका और शिवजी ने सोचा मई अगर इस बालक को दंड दूंगा वो उचित नहीं है। मई अपने गणों को भेजता हूँ इसे दंड देने के लिए। शिवजी क्रोदित होक चले गए और नंदी और ब्रिंगी को भेजा और कहा उसे वह से हटाओ।
नंदी और ब्रूगी और ननदी ने समजाने को प्रयत्न कीया लेकिन गणेश माने नहीं। दोनों ने गणेश को मारने की कोशिश की गणेश ने मारके भगाड़िया। और शिव और क्रोदित हुए और सरे गाणो को भेजे। लेकिन गणेश गणों को मारने भेजा। और माता पार्वती द्वार पे आई। और क्रोदित हुई और पार्वती ने गणेश को बहोत सकती दी। और देवता लड़ाई देखने आये और अच्चार्य चकित हुए और शिव के पास पोहचे। बहोत ही क्रोधित हुए और गणेशजी को दण्डित करने को कहा लेकिंन ब्रह्मा जी ने शांत किया और कहा मई उस बालक को समजाने जाता हूँ। और ब्रह्माजी मिलने पओचे ब्रहाजी को और इंद्रा भेजा पार्वती जी ने गणेश की रक्षा के लेकिये कलिका को भेजा इन्द्र को विवस होके वापस आगये और सभी मिलके गणेश कालिका और दुर्गा माता रक्षा करते थे और सभी वापस आगया। और शिवजी और विष्णु युद्ध करने आये कहा माफ़ी मांगो लेकिन गणेशजी नहीं माने और सस्त्र शिवजी और विस्नु जी के समाप्त हो गए और विस्णुजी कहा में उसे युद्दा मई ऊर्जा लगता हूँ और शिवजी ने पीछे गणेशजी को त्रिशूल से उसके सर को उदादिया। और देवी ने क्रोदित होके सारे देवो को मरने के लिए पारवती ने उनकी सारी सकती बोला। सारे देव ने नारद को मानाने के लिए भेजा।
नारद ने माता को मानाने लगा। और माता ने कहा मेरे पुत्र को पुनः जीवित कीजिये। और शिव जी ने सबलोग को जो भी जीवित पशु मिले उनका सर लेके आओ।
और सभी लोग पसु को खोजने गए।
विष्णुजी ने हाथी का मस्तक आये। और गणेश को हाथी का मस्तक किया। ब्रहाजी ने जीवित किया और उन्होंने विध्नहर्ता का दिया।
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